सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

दंड न्यायालय और उनके कार्य

 सेशन न्यायालय के अलावा हर राज्य में निम्नलिखित प्रकार के दण्ड न्यायालयों की व्यवस्था की गई है


1. सेशन न्यायालय- (अ) प्रत्येक राज्य में सेशन खण्ड होंगे। प्रत्येक सेशन खंड एक जिला होगा। लेकिन महानगर क्षेत्र होने पर उसमें अलग ही सेशन खण्ड अथवा जिला होगा।


(ब) राज्य सरकार उच्च न्यायालय से सलाह के बाद जिलों की सीमाओं व संख्या में परिवर्तन कर सकती है।


(स) राज्य सरकार उच्च न्यायालय से विचार विमर्श के बाद जिले को उपखण्डों में विभाजित कर सकती है और ऐसे उपखण्डों की संख्याओं व सीमाओं में परिवर्तन कर सकती है।


(द) दण्ड प्रक्रिया संहिता (सन् 1973) के आरंभ के समय जो सेशन खण्ड मौजूद थे वह जिले और उपखण्ड के अधीन बनाए गए समझे जाएंगे।


उपरोक्त आधार पर प्रत्येक जिले में एक सेशन अदालत होती है। सेशन न्यायालय या सेशन जज मृत्युदण्ड तक की सजा प्रदान कर सकता है। लेकिन इस फैसले से उच्च न्यायालय का सहमत होना जरूरी है। जबकि सहायक सेशन जज द्वारा मृत्युदण्ड, आजीवन कारावास और दस वर्ष से अधिक की सजा जैसे दण्ड नहीं दिए जा सकते हैं। ऐसा सी०आर०पी०सी० की धारा 28 के प्रावधान अनुसार है


• प्रत्येक सेशन न्यायालय में एक न्यायालय पीठासीन होगा जो उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त होता है। .


उच्च न्यायालय को अधिकार है कि अपर सेशन न्यायाधीशों और सहायक सेशन न्यायाधीशों को भी सेशन न्यायालय में अधिकारिता का प्रयोग करने के लिए नियुक्त कर सके।


सेशन न्यायालय के न्यायाधीश का पद रिक्त होने पर उच्च न्यायालय अपनी शक्तियां का प्रयोग करते हुए लंबित मामलों का विवरण करने के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की व्यवस्था कर सकता है।


2. प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट और (महानगर क्षेत्र में) महानगर मजिस्ट्रेट-(अ) उच्च न्यायालय प्रत्येक जिले में एक प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकता है।

(ब) उच्च न्यायालय किसी प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकता है।


• न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग द्वारा तीन वर्ष से अनधिक का कारावासीय दण्ड या 50,000 ₹ तक का जुर्माना या दोनों दण्ड प्रदान किया जा सकता है। यह प्रावधान सी०आर०पी०सी० की धारा 29 के अनुसार किया गया है।


महानगर मजिस्ट्रेट-प्रत्येक महानगर क्षेत्र में कितने महानगर मजिस्ट्रेटों के कार्यालय होंगे। यह राज्य सरकार उच्च न्यायालय से परामर्श करने के बाद अधिसूचना द्वारा घोषित करती है। ऐसे न्यायालयों के पीठासीन अधिकारी उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। प्रत्येक महानगर मजिस्ट्रेट की अधिकारिता और उसकी शक्तियों का विस्तार सर्वत्र महानगर क्षेत्र में होता है।


महानगर मजिस्ट्रेट की शक्तियां न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग के समकक्ष होती


मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट- इसकी न्यायिक शक्तियां जिला मजिस्ट्रेट के समान ही होती हैं।


न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय वर्ग-एक वर्ष के कारावास या 5000 ₹ का जुर्माना या दोनों का संयुक्त दण्ड देने की शक्ति रखता है। यह प्रावधान सी०आर०पी०सी० की धारा 29 में किया गया है।


मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सी०आर०पी०सी० की धारा 29 के अनुसार नियुक्त होता है। यह मृत्युदण्ड अथवा सात वर्ष से अधिक के कारावास को छोड़कर अन्य सजाएं देने की शक्तियां रखता है।


जिला मजिस्ट्रेट-प्रत्येक राज्य के जिले में एक जिला मजिस्ट्रेट की अदालत लगती है। इसे कार्यपालक मजिस्ट्रेट भी कहा जाता है और इसकी शक्तियां जिले में सर्वत्र होती हैं और अधिकारिता भी।


उपखण्ड स्तरीय कार्यपालक मजिस्ट्रेट-तहसील स्तर की अदालत के लिए उपखण्ड कार्यपालक मजिस्ट्रेट नियुक्त होते हैं।


विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट-राज्य सरकार खास क्षेत्रों के लिए अथवा खास कार्यो का पालन करने के लिए विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट को नियुक्त कर सकती है। राज्य सरकार जितने समय के लिए उचित समझे और जितने स्तर की शक्तियां देना उचित समझे प्रदान कर सकती है। इसी प्रकार से विशेष महानगर कार्यपालक मजिस्ट्रेट की नियुक्ति की जाती है।


लोक अभियोजक-न्यायालय के विधिक मामलों में लोक अभियोजक की प्रस्तावना की गई है। वह निम्न प्रकार से है


1. प्रत्येक उच्च न्यायालय के लिए केन्द्रीय या राज्य सरकार उस उच्च न्यायालय से परामर्श के बाद स्थिति के अनुसार अभियोजक अपील एवं अन्य कार्यवाही के संचालन के लिए एक लोक अभियोजक नियुक्त करेगी और एक या अधिक अपर लोक अभियोजक नियुक्त कर सकती है।


2. केन्द्रीय सरकार किसी जिले या स्थानीय क्षेत्र में मामलों का संचालक करने के लिए एक या अधिक लोक अभियोजक नियुक्त कर सकती है। 3. राज्य सरकार प्रत्येक जिले के लिए एक लोक अभियोजक एवं एक या अधिक अपर लोक अभियोजक नियुक्त कर सकती है।


4. जिले के लिए नियुक्त लोक अभियोजक या अपर लोक अभियोजक किसी अन्य जिले के लिए भी स्थिति के अनुरूप नियुक्त किए जा सकते हैं। 


5. जिला मजिस्ट्रेट और सेशन न्यायाधीश के परामर्श से ऐसे व्यक्तियों के नामों का पैनल तैयार किया जाता है जो लोक अभियोजक या अपर लोक अभियोजक नियुक्त किए जाने की योग्यता रखते हैं।


6. यदि जिला मजिस्ट्रेट द्वारा तैयार किए गए नामों के पैनल में किसी व्यक्ति का नाम नहीं है तो उसे लोक अभियोजक या अपर लोक अभियोजक के बतौर नियुक्त नहीं किया जा सकता है।


7. अभियोजक अधिकारी का आशय या प्रति अभिप्राय लोक अभियोजक, अपर लोक अभियोजक या सहायक लोक अभियोजक के रूप में परिभाषित किया गया है।



टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 धारा 53 (Rajasthan tenancy act 1955 sec. 53)

आइए जानते हैं क्या है राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 की धारा 53             Watch now video

अधिनियम (Act)क्या होता है।

                        सामान्यतया यह देखा जाता है कि सरकार नये नियम व कानून बनाने व उन्हें लागू करने के लिए अधिनियम पारित करती है। और इन अधिनियमों को सरकार अपने शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा जारी करके जनता में लागू करती है। - तो आईये जानते है कि क्या होता है अधिनियम-                        # अधिनियम (Act)# वे विधि-विधान अथवा कानून जो समाज के सुचारू रूप से संचालन के लिए राज्य के द्वारा गठित किए जाते हैं। प्रजातांत्रिक पद्धति के अंतर्गत इन का गठन प्रजा द्वारा निर्वाचित सदस्यों के उन समूहों के द्वारा होता है जो इस कार्य हेतु उस पद्धति के अंतर्गत अधिकृत होते हैं। भारतीय संविधान में अधिनियमो के गठन का कार्य संसद और विधानसभाओं को सौंपा गया है। - संसद सिर्फ उन्हीं विषयों पर अधिनियम बना सकती है जो केंद्रीय सूची में वर्णित है। - विधानसभा उन्हीं विषयों पर अधिनियम बना सकती है जो राज्य सूची में वर्णित है।

विवाह पंजीकरण (Marriage Registration) कैसे करें? जानिए आवश्यक दस्तावेज़, शुल्क और प्रक्रिया

  विवाह पंजीकरण का उद्देश्य (Purpose of Registration of Marriage) पंजीकरण का उद्देश्य शादी को आधिकारिक रूप से मान्य करना और भविष्य में कुछ ग़लत होने पर पति और पत्नी दोनों को सामाजिक और कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है। एक विवाह प्रमाण पत्र, जो आपकी शादी के पंजीकृत होने के बाद ही जारी किया जाएगा, भविष्य के सभी संयुक्त उपक्रमों में आवश्यक है, जैसे कि देश में एक साथ घर खरीदना या जीवनसाथी के लिए आवेदन करना यदि आप विदेश यात्रा करने का निर्णय लेते है। भारत में, विवाह के पंजीकरण के क्षेत्र को नियंत्रित करने वाले निम्नलिखित दो कानून हैं: 1.हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 हिंदू विवाह अधिनियम 1955 विवाह पंजीकरण को नियंत्रित करता है जहां पति और पत्नी दोनों हिंदू, बौद्ध, जैन या सिख हैं, या उन्होंने इन धर्मों में से एक। ऐन धर्मांतरण किया हो। यह याद रखना चाहिए कि हिंदू विवाह अधिनियम केवल उन विवाहों पर लागू होता है जो पहले हो चुके हैं। 2.विशेष विवाह अधिनियम, 1954 विशेष विवाह अधिनियम 1954 एक धर्मनिरपेक्ष कानून है और सभी धर्म के व्यक्तियों पर लागू होता है। इस अधिनियम के तहत किसी भी धर्म का कोई भी व्यक्ति प...