यदि कोई व्यक्ति अपराध करता है, तो उसके विरुद्ध एफ०आई०आर० दर्ज कराई जाती है, परिस्थितिवश एफ०आई०आर० दर्ज न होने की दशा में हर व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह मजिस्ट्रेट के यहां परिवाद अथवा इस्तगासा दाखिल कर सके। परिवाद के माध्यम से व्यक्ति अपराधी के विरुद्ध कार्यवाही करवा सकता है, वही परिवाद के सामान्य अर्थों में आता है। परिवाद की परिभाषा सी०आर०पी०सी० की धारा-2 में दी गई है।
परिवाद को लिखित एवं मौखिक दोनों प्रकार से दर्ज करवाया जा सकता है। यह भी आवश्यक नहीं कि अपराध का नामजद परिवाद दायर किया जाए। परिवाद को अज्ञात अपराधों के विरुद्ध भी दर्ज करवाया जा सकता है। सी०आर०पी०सी० की धारा 200 के तहत मजिस्ट्रेट इस्तगासे पर कार्यवाही करता है
परिवाद का संक्षिप्त विचारण सी०आर०पी०सी० की धारा 260 या महानगर मजिस्ट्रेट और चीफ जूडिशियल मजिस्ट्रेट के यहां किया जाता है। यदि मजिस्ट्रेट को कार्यवाही करने का कोई कारण नहीं मिलता, तो वह उसे खारिज भी कर सकता है। किन्तु यदि मजिस्ट्रेट की जानकारी में आता है कि परिवाद से सम्बन्धित अपराध की जांच पुलिस कर रही है, तो वह पुलिस अधिकारी से इस विषय में रिपोर्ट मांगेगा। वह स्वयं द्वारा की जा रही जांच व विचारण की कार्यवाही रोक देगा
परिवाद के सन्दर्भ में संक्षिप्त विचारण का सामान्य शाब्दिक अर्थ है किसी मामले की सुनवाई शीघ्रतापूर्वक करना। इस विषय में संक्षिप्त विचारण का उल्लेख सी०आर०पी०सी० की धारा 260 से 265 में वर्णित है। इसके अनुसार निम्न अपराधों पर दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 (संशोधित) के तहत मुख्य-न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट, महानगर मजिस्ट्रेट उचित समझे जाने पर विचारण कर सकता है-
(1) जो अपराध मृत्यु, आजीवन कारावास अथवा दो वर्ष के कारागारीय दण्ड से दण्डनीय नहीं हो।
(2) भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 379, 380, 381 के अधीन चोरी का अपराध। लेकिन चुराई गई सम्पत्ति का मूल्य दो हजार रू. से अधिक नहीं है।
• दण्ड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम सन् 2005 की धारा 23 (क) द्वारा दो सौ रू. के स्थान पर दो हजार रु. पर प्रस्थापित किया गया है।
(3) चोरी की सम्पत्ति प्राप्त करना या उसे अधिकार में रखे रखना। लेकिन ऐसी सम्पत्ति का मूल्य दो हजार रु. से अधिक नहीं होना चाहिए।
(4) चुराई हुई सम्पत्ति को छिपाने या उसके व्यय न करने में सहायता देने का कार्य, लेकिन जहां सम्पत्ति का मूल्य दो हजार ₹ से अधिक न हो
(5) भारतीय दण्ड संहिता की धारा 454 व 456 के अधीन किया गया अपराध
(6) भारतीय दण्ड संहिता की धारा 504 और 506 के अधीन अपराध
(7) पूर्ववर्ती अपराधों में से किसी को करने का प्रयत्न, जब ऐसा प्रयत्न अपराध हो
(8) पूर्ववर्ती अपराधों में से किसी का दुष्प्रेरण
(9) ऐसे कार्य से होने वाला कोई जुर्म या अपराध जिसकी बाबत पशु अतिचार अधिनियम, 1871 (सन् 1871 का 1) की धारा 20 के अधीन परिवाद दायर किया जा सकता है।
(10) परिवाद पेश होने पर धारा 156 (3) दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत मजिस्ट्रेट संज्ञेय प्रकरण की प्राथमिकी दर्ज करवाने व जांच के आदेश दे सकते हैं।
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