भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है।
संपूर्ण संविधान का सार अनुच्छेद 21 में निहित है यह व्यक्ति की प्राण और दैहिक स्वतंत्रता को संरक्षण प्रदान करता है संवैधानिक फलों का उपभोग मानव रूप में देह करती है अतः देह की स्वतंत्रता एवं उसका संरक्षण महत्वपूर्ण है यदि देह सुरक्षित एवं संरक्षित नहीं है तो विधि,विधान अधिकार और उपचार व्यर्थ है राज्य का भी यह प्रथम कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों के शरीर एवं संपत्ति की रक्षा करें अनुच्छेद 21 में यह कहा गया है कि "किसी भी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अधीन ही वंचित किया जा सकेगा अन्यथा नहीं।
1.गरिमा युक्त जीवन जीने का अधिकार
2.लावारिस मृतकों का दाह संस्कार
3.संतान पैदा करने या न करने के विकल्प का अधिकार
4.भिखारियों का पुनर्वास
5.धूम्रपान पर रोक
6.रैगिंग पर रोक
7.जानने का अधिकार(Right to information)
8.जीवन का आनंद पूर्वक उपयोग उपभोग करने का अधिकार
9.निशुल्क खाद्य सामग्री पाने का अधिकार
10.शिक्षा का अधिकार
11.चिकित्सा का अधिकार
12.पर्यावरण संरक्षण का अधिकार
13.गिरफ्तार व्यक्ति की यातना पर रोक
14.खाप पंचायतों पर रोक
15.बिजली एवं पानी की सुविधा प्रदान करना
16.अंतरजातीय विवाह करने का अधिकार
17.एकांतता का अधिकार(Right to privacy)
18.आतंकवादी हिंसा पर रोक
इनमें से कुछ अधिकार विस्तृत रूप में निम्नानुसार उल्लेखित है:-
1.लावारिस मृतकों का दाह संस्कार
मृत्यु के पश्चात भी इस अधिकार का अस्तित्व रहता है उच्चतम न्यायालय ने एक निर्णय में यह कहा कि सड़कों एवं सार्वजनिक स्थानों पर मरने वाले लावारिस व्यक्तियों का दाह संस्कार अथवा दफन संस्कार पूर्ण स्वच्छता के साथ एवं धार्मिक अनुष्ठानों के अनुरूप किया जाना चाहिए दूरदर्शन पर उनके चित्र प्रदर्शित किए जाने की भी व्यवस्था की जानी चाहिए ताकि उनके परिजनों को पता चल सके
2.भिखारियों का पुनर्वास
एक मुद्दे में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाया कि भिखारियों की समस्या एक गंभीर समस्या है लेकिन भिखारियों के उन्मूलन से पूर्व उनके पुनर्वास की व्यवस्था करना राज्य का दायित्व है।
3.धूम्रपान पर रोक
हमारे न्यायालय ने सार्वजनिक स्थानों पर इस पर प्रतिबंध लगाने को कहा ताकि धूम्रपान नहीं करने वाले व्यक्तियों को इससे इसके खतरों से बचाया जा सके
4.रैगिंग पर रोक
इसका अर्थ है शिक्षण संस्थाओं में पुराने विद्यार्थियों द्वारा नहीं विद्यार्थीयो के साथ की जाने वाली छेड़छाड़,हिंसा आदि अतः शिक्षण संस्थाओं के प्रबंधकों एवं प्रधानाचार्य का दायित्व है कि वे रैगिंग पर रोक लगाने के उपाय करें अन्यथा उन्हें इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं
5.निशुल्क खाद्य सामग्री पाने का अधिकार
पीयूसी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह भी निर्धारित किया गया कि ऐसे लोग जो खाद्य सामग्री खरीदने में असमर्थ होने के कारण भूख से पीड़ित हैं राज्य से निशुल्क खाद्य सामग्री पाने के हकदार है।
6.शिक्षा का मूल अधिकार
संविधान के 86 वें संशोधन अधिनियम 2002 द्वारा संविधान में एक नया अनुच्छेद 21(क) जोड़कर 6 से 14 वर्ष तक की आयु के बालकों के लिए निशुल्क शिक्षा को मूल अधिकार बना दिया गया है।
7.चिकित्सा का अधिकार
परमानंद कटारा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के शीघ्र चिकित्सा सहायता प्राप्त करने के अधिकार को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत एक मूल अधिकार माना गया है इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह भी निर्धारित किया कि चिकित्सा अधिकारियों का यह कर्तव्य है कि जब भी उनके समक्ष किसी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को लाया जाए तो वे विधिक औपचारिकताओं को पूरा करने की प्रतीक्षा किए बिना उसे तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराएं
8.खाप पंचायतों पर रोक
विभिन्न जातियों के लड़की-लड़कियों को विवाह करने से रोकने उन्हें यातना देने तथा प्रतिष्ठा मृत्यु को मान्यता देने वाली खाप पंचायतों की उपरोक्त गतिविधियां अवैध है।
9.एकांतता का अधिकार(Right to privacy)
किसी भी व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति की एकांतता भंग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती
विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया ही प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का भंग कर सकती है:-
प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता को न्यून अथवा प्रतिबंधित करने वाली यदि कोई शक्ति है तो वह विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया है इस स्वतंत्रता को छीनने का एकमात्र अधिकार सिर्फ सरकार को ही है।
निशुल्क विधिक सहायता का अधिकार भी प्राण एवं देह की स्वतंत्रता का अंग है:-
निम्नलिखित लोगों को इस सहायता को प्राप्त करने का अधिकार है:-
1.जिसके पास न्यायालय तक पहुंचने के लिए साधन नहीं है अर्थात जो निर्णय की एक प्रति तक प्राप्त करने के लिए सक्षम नहीं है
2.जिसे ईमानदारी के कारण ऋण की अदायगी नहीं किए जाने पर करावासित होना पड़ता है
3.जिसे अभ्यस्त अपराधी मानते हुए अनावश्यक एवं मनमाने तौर पर निगरानी में रखा जाता है
4.जो त्वरित विचार एवं निशुल्क विधिक सहायता के अभाव में वर्षों से कारागृह की सलाखों में कैद हैं
5.जो निरुद्ध होने के कारण विधि व्यवसायियों से संपर्क नहीं कर पाते हैं।
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