यदि कोई व्यक्ति अपराध करता है, तो उसके विरुद्ध एफ०आई०आर० दर्ज कराई जाती है, परिस्थितिवश एफ०आई०आर० दर्ज न होने की दशा में हर व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह मजिस्ट्रेट के यहां परिवाद अथवा इस्तगासा दाखिल कर सके। परिवाद के माध्यम से व्यक्ति अपराधी के विरुद्ध कार्यवाही करवा सकता है, वही परिवाद के सामान्य अर्थों में आता है। परिवाद की परिभाषा सी०आर०पी०सी० की धारा-2 में दी गई है। परिवाद को लिखित एवं मौखिक दोनों प्रकार से दर्ज करवाया जा सकता है। यह भी आवश्यक नहीं कि अपराध का नामजद परिवाद दायर किया जाए। परिवाद को अज्ञात अपराधों के विरुद्ध भी दर्ज करवाया जा सकता है। सी०आर०पी०सी० की धारा 200 के तहत मजिस्ट्रेट इस्तगासे पर कार्यवाही करता है परिवाद का संक्षिप्त विचारण सी०आर०पी०सी० की धारा 260 या महानगर मजिस्ट्रेट और चीफ जूडिशियल मजिस्ट्रेट के यहां किया जाता है। यदि मजिस्ट्रेट को कार्यवाही करने का कोई कारण नहीं मिलता, तो वह उसे खारिज भी कर सकता है। किन्तु यदि मजिस्ट्रेट की जानकारी में आता है कि परिवाद से सम्बन्धित अपराध की जांच पुलिस कर रही है, तो वह पुलिस अधिकारी से इस विषय में रिपोर्ट मांगेगा। व...
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